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स्क्रैप क्या है?

जो चीज़ अपना काम पूरा कर चुकी है, वही दोबारा कच्चा माल बनकर लौटती है — यही स्क्रैप है।

All Pricess टीम · 49+ साल का स्क्रैप एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट अनुभव · अपडेट: 29 अक्टूबर 2026

स्क्रैप यानी वो पुराना, टूटा या बेकार सामान जिसे गलाकर, काटकर या छाँटकर दोबारा इस्तेमाल लायक कच्चा माल बनाया जा सके। हिंदी में इसे कबाड़ कहते हैं। पुरानी गाड़ी, टूटी मशीन, बिजली के तार, बर्तन, अख़बार, प्लास्टिक की बोतलें — सब किसी न किसी फैक्ट्री का कच्चा माल हैं।

स्क्रैप और कचरा एक नहीं हैं

कचरा वो है जिसकी कोई क़ीमत नहीं बचती और जो फेंका जाता है। स्क्रैप की क़ीमत होती है, क्योंकि उससे दोबारा कुछ बनता है। फ़र्क़ अक्सर सिर्फ़ छँटाई का होता है — मिला-जुला ढेर कचरा लगता है, पर वही ढेर अलग-अलग छाँट दें तो हर हिस्से का अपना भाव निकल आता है।

स्क्रैप की मुख्य किस्में

  • लोहा और स्टील: भारी लोहा (HMS), कास्ट आयरन, सरिया, टीन, कतरन, स्टेनलेस स्टील
  • नॉन-फेरस मेटल: तांबा, पीतल, एल्युमिनियम, ज़िंक, सीसा (लेड), निकल
  • कागज़: अख़बार, कॉपी-किताब, गत्ता (कार्डबोर्ड)
  • प्लास्टिक: बोतल, बाल्टी, पाइप, फ़िल्म — हर किस्म अलग बिकती है
  • ई-वेस्ट: मोबाइल, कंप्यूटर, सर्किट बोर्ड, पुरानी बैटरी

Ferrous और Non-ferrous का मतलब

Ferrous वो धातु है जिसमें लोहा (Iron) होता है — इसलिए वो चुंबक से चिपकती है। लोहा और ज़्यादातर स्टील इसी में आते हैं। Non-ferrous धातुओं में लोहा नहीं होता — तांबा, पीतल, एल्युमिनियम, ज़िंक। ये चुंबक से नहीं चिपकतीं, ज़ंग नहीं पकड़तीं और किलो के हिसाब से कहीं ज़्यादा महँगी बिकती हैं। दुकान पर सबसे आसान जाँच यही है: चुंबक लगाइए — चिपका तो लोहा, नहीं चिपका तो आगे जाँचिए।

भाव किन बातों से बनता है

  • धातु का बड़ा बाज़ार: तांबा-एल्युमिनियम का भाव LME और MCX से चलता है; लोहे का भाव देसी मंडियों और इंगट से। (LME-MCX समझिए)
  • शुद्धता: जितना साफ़ और एक किस्म का माल, उतना ऊँचा भाव।
  • मिलावट: प्लास्टिक, रबर, मिट्टी, तेल — हर चीज़ पर कटौती।
  • मात्रा और जगह: बड़ा लॉट और मंडी के पास का माल बेहतर भाव लाता है, क्योंकि ढुलाई कम लगती है।
  • माँग का मौसम: निर्माण का काम तेज़ हो तो लोहा चढ़ता है; बारिश में अक्सर दबता है।

कबाड़ का सफ़र — घर से भट्ठी तक

  1. घर, दुकान, फैक्ट्री या बिल्डिंग से माल निकलता है।
  2. गली का फेरीवाला या कबाड़ी उसे ख़रीदता है।
  3. कबाड़ी गोदाम पर छाँटकर बड़े व्यापारी (होलसेलर) को बेचता है।
  4. होलसेलर बड़ा लॉट बनाकर फर्नेस, रोलिंग मिल, पेपर मिल या रीसाइक्लिंग प्लांट तक भेजता है।
  5. वहाँ माल पिघलकर या गलकर नया कच्चा माल बनता है — और चक्र फिर शुरू।

हर कड़ी पर थोड़ा मुनाफ़ा जुड़ता है। इसलिए जो व्यापारी इस चेन में ऊपर तक सीधा पहुँच बना लेता है, उसकी कमाई सबसे अच्छी रहती है — यही काम Buyer & Seller Connect आसान करता है।

स्क्रैप क्यों ज़रूरी है

एक टन लोहा कबाड़ से बनाने में खदान से निकालने के मुक़ाबले बहुत कम बिजली, पानी और कोयला लगता है। एल्युमिनियम और तांबे में ये बचत और भी बड़ी है। यानी स्क्रैप का काम कमाई के साथ-साथ देश के संसाधन भी बचाता है।

बाज़ार के कुछ आम शब्द

  • कतरन: कटिंग के बाद बचे छोटे टुकड़े
  • बुरादा (Turning/Boring): मशीन पर कटाई से निकले बारीक छिलके
  • HMS: Heavy Melting Scrap — भट्ठी में गलाने लायक भारी लोहा
  • कटौती: मिलावट या नमी के बदले वज़न में की गई कमी
  • लॉट: एक बार में बिकने वाला पूरा माल
❓ सवाल-जवाब

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

स्क्रैप को हिंदी में क्या कहते हैं?+
स्क्रैप को हिंदी में कबाड़ कहते हैं — यानी पुराना या बेकार सामान जिसे दोबारा कच्चे माल की तरह इस्तेमाल किया जा सके।
सबसे महँगा स्क्रैप कौन-सा है?+
आम कबाड़ में तांबा सबसे महँगा बिकता है, उसके बाद पीतल और एल्युमिनियम। लोहा भारी मात्रा में बिकता है पर किलो का भाव कम होता है।
Ferrous और Non-ferrous स्क्रैप में क्या फ़र्क़ है?+
Ferrous में लोहा होता है और वो चुंबक से चिपकता है। Non-ferrous — तांबा, पीतल, एल्युमिनियम — में लोहा नहीं होता, चुंबक से नहीं चिपकते और उनका भाव कहीं ऊँचा होता है।
स्क्रैप का भाव रोज़ क्यों बदलता है?+
क्योंकि धातु का भाव देश-विदेश की माँग, LME-MCX, डॉलर और मंडी की हालत से जुड़ा है। All Pricess इसी बदलाव को हर घंटे WhatsApp पर भेजता है।
क्या ई-वेस्ट और पुरानी बैटरी किसी को भी बेच सकते हैं?+
ई-वेस्ट और बैटरी के लिए सरकार के अलग नियम हैं। इन्हें अधिकृत (रजिस्टर्ड) रीसाइक्लर या कलेक्शन सेंटर को देना ही सही है।
A All Pricessआमतौर पर तुरंत जवाब